राम झरोखा गंदमादन

समुद्र के किनारे एक छोटी पहाड़ी को गन्दमादन कहते हैं। पहाड़ी पर श्रीराम के चरण चिह्न बने हैं। यहाँ खडे़ होकर श्रीराम ने समुद्र का सुन्दर दृश्य देखा था। इसलिए इसे रामझरोखा कहा जाता है।

एकान्त राम मंदिर

रामेश्वरम धाम से कुछ दूरी पर जंगल में एकान्त स्थान पर एक उपेक्षित सा मंदिर हैं। लंका जाने से पूर्व श्रीराम ने युद्ध नीति पर पहले स्वयं तथा बाद में मंत्रियों के साथ मंत्रणा की थी।

विलुंडी तीर्थ रामनाथपुरम

सेना के लिए शुद्ध मीठे जल हेतु श्रीराम ने बाण मार कर यहाँ जल स्रोत बनाया था। तंगचिमडम से लगभग 10 कि.मी. दूर समुद्र में स्थित इस कुएँ से मीठा पानी निकलता है। बैशाख तथा आषाढ़ में यहाँ पानी विशेष रूप से मीठा होता है।

सेतु अवशेष छेदुकरई रामनाथपुरम

छेदु सेतु का अपभ्रंश है तथा तमिल शब्द करई का अर्थ है कोना। यहाँ पुल की आधार शिला रखी गयी थी। छेदुकरई से समुद्र में 2 कि.मी. भीतर तक जायें तो सेतु के अवशेष देखे जा सकते हैं। ये सेतु के स्तम्भ हो सकते हैं। ये सेतु समुद्र में 10-11 फुट गहरे हैं।

दर्भशयनम त्रिपुल्लाणी ( आदि रामेश्वर )

त्रिपुल्लाणी समुद्र तट पर पहुँच कर श्रीराम समुद्र से रास्ता लेने के लिए तीन दिन तक तपस्यारत पृथ्वी पर लेटे रहे। यहीं श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इसे आदि रामेश्वर माना जाता है। यहीं समुद्र ने प्रकट होकर श्रीराम को पुल बनाने की युक्ति बतायी थी।