प्राचीन परम्परा से अयोध्याजी से पूर्व दिशा में एक कच्चे मार्ग को राम जानकी मार्ग कहा जाता रहा है। अब यह पक्की सड़क बन गयी है तथा इसका नाम श्रीराम जानकी मार्ग ही है। लोकमान्यता के अनुसार बारात के साथ श्री सीताराम जी का रथ इसी मार्ग से आया था। वा.रा. 1/77/06 मानस 1/342 से …
हरी, का अपभ्रंश है दोहरी। श्रीराम तथा परशुराम जी दोनों ही विष्णु के अवतार हुए हैं। दोनों की यहाँ सरयूजी के किनारे भेंट हुई थी इसीलिए स्थल का नाम दोहरी घाट है। वाल्मीकि जी के अनुसार परशुराम जी से भेंट के बाद, बारात अयोध्या पहुंची थी। वा.रा. 1/74/18 से 1/76 पूरे अध्याय।
श्रीराम की बारात का तीसरा विश्राम स्थल श्रीराम जानकी मार्ग पर डेरवा गाँव है। चूँकि बारात ने यहाँ डेरा डाला था, इसीलिए गाँव का नाम आज भी डेरवा है। वा.रा. 1/69/7 मानस 1/303/3, 1/342/4 से 1/343/4 तक।
मिथिला में लोक परम्परा के अनुसार विवाह के चैथे दिन वेदी बना कर पुनः विवाह की परम्परा है। आज भी इसे चैथाड़ी कहा जाता है। चैथाड़ी के बाद ही विवाह संस्कार पूर्ण माना जाता है। यहां चैथाड़ी की वेदी बनी थी। इसलिए गांव का नाम भी वेदी वन है। निकटवर्ती गांवों के नाम भी इस …
यह स्थान पूर्वी चम्पारन में मोतिहारी से लगभग 20 कि.मी. पूर्व दक्षिण कोण में है। माना जाता है कि श्रीराम की बारात ने यहाँ रात्रि विश्राम किया था। यहाँ कुण्ड में सीता माँ का कंगन खुला था। इस कुण्ड में पानी नीचे से ही आता है तथा कभी सूखता नहीं। पास ही भूमि में एक …




